धनतेरस: आज है भगवान धन्वंतरि का जन्मदिन, ऐसे हुए थे प्रकट

आप में से बहुत कम लोग जानते हैं कि धनतेरस केवल धन-समृद्धि का दिवस मात्र नहीं है, यह दिन वास्तव में भारतीय वैदिक जगत का चिकित्सा दिवस या डाक्टर दिवस भी है। पंचम वेद के रूप में माने जाने वाले ‘आयुर्वेद के आदिदेव भगवान धन्वंतरि’ को क्षीरसागर के मंथन से उत्पन्न चौदह रत्नों में से एक माना जाता है जिनका अवतरण इस धरा पर आरोग्य, स्वास्थ्य ज्ञान और चिकित्सा ज्ञान से भरे हुए अमृत कलश को लेकर हुआ। वैदिक सनातन धर्म में भगवान विष्णु जी के 24 अवतारों में भगवान धन्वंतरि जी 12वें अवतार हैं।

माना जाता है कि देवासुर संग्राम में घायल देवों का उपचार भगवान धन्वंतरि के द्वारा ही किया गया, भगवान धन्वंतरि विश्व के आरोग्य एवं कल्याण के लिए बार-बार अवतरित हुए हैं। इस तरह भगवान धन्वंतरि के प्रादुर्भाव के साथ ही सनातन, सार्थक एवं शाश्वत आयुर्वेद भी अवतरित हुआ जिसने अपने उत्पत्ति काल से आज तक जन-जन के स्वास्थ्य एवं संस्कृति का रक्षण किया है। सर्वभय व सर्व रोगनाशक व आरोग्य देव भगवान धन्वंतरि स्वास्थ्य के अधिष्ठाता होने से विश्व वैद्य हैं।

वर्तमान काल में आयुर्वेद के उपदेश उतने ही पुण्य एवं शाश्वत हैं जितने प्रकृति के नियम। भगवान धन्वंतरि ने आयुर्वेद को आठ अंगों में विभाजित किया जिससे आयुर्वेद की विषय वस्तु सरल, सुलभ एवं जनोपयोगी हुई। आज भगवान धन्वंतरि जी की जयंती एवं विशेष पूजा-अर्चना, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी अर्थात धनतेरस के दिन मनाते हुए प्रत्येक मनुष्य के लिए प्रथम सुख निरोगी काया एवं श्री समृद्धि की कामना की जाती है।

धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि से प्रार्थना की जाती है कि वे समस्त जगत को निरोग कर मानव समाज को दीर्घायु प्रदान करें। इन्होंने आयुर्वेद शास्त्र का उपदेश विश्वामित्र जी के पुत्र सुश्रुत जी को दिया। इस ज्ञान को अश्विनी कुमार तथा चरक आदि ऋषियों ने आगे बढ़ाया। यह ज्ञान आयुर्वेद द्वारा समस्त सजीव जगत को मानसिक व शारीरिक रूप से पूर्ण रूप से स्वस्थ रहने का ज्ञान प्रदान करता है। आधुनिक जीवन में मनुष्य अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त है, उसकी कार्यक्षमता भी कम हो रही है लेकिन प्राचीन काल में ऋषियों-मुनियों ने आयुर्वेद के ज्ञान से अपने शरीर को स्वस्थ एवं निरोगी रखा।

रोगों से रक्षा 
धन्वंतरि का प्रादुर्भाव समुद्र मंथन से त्रयोदशी के दिन हुआ था और उनके हाथ में अमृत कलश था, भगवान धन्वंतरि द्वारा सभी प्राणियों को आरोग्य सूत्र प्रदान किए गए इसीलिए धन त्रयोदशी के दिन धन्वंतरि पूजा का विशेष विधान है। इससे परिवार के सभी रोग शोक का जड़ से नाश होता है और स्वस्थ शरीर की प्राप्ति होती है।

आयुर्वेद जगत के प्रणेता भगवान धन्वंतरि आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देव हैं। सर्वभय व सर्वरोग नाशक देव चिकित्सक आरोग्य देव धन्वंतरि प्राचीन भारत के एक महान चिकित्सक थे जिन्हें देव पद प्राप्त हुआ था। भगवान विष्णु के अवतार धन्वंतरि का पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मंथन के समय हुआ था।

पुराणों के अनुसार अमृत प्राप्ति हेतु देवताओं और असुरों ने जब समुद्र मंथन किया तब उसमें से अत्यंत दिव्य कांति युक्त, आभूषणों से सुसज्जित, सर्वांग सुंदर, तेजस्वी, हाथ में अमृत कलश लिए हुए एक आलौकिक पुरुष प्रकट हुए। वे ही आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धन्वंतरि के नाम से विख्यात हुए। इनका आविर्भाव कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी को हुआ और इसीलिए इनकी जयंती आरोग्य देवता के रूप में प्रतिवर्ष कार्तिक पक्ष त्रयोदशी जिसे धन त्रयोदशी कहा जाता है, सम्पन्न की जाती है।

समुद्र मंथन के दौरान शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरि, चतुर्दशी को कल्पवृक्ष, अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का समुद्र मंथन से प्रादुर्भाव हुआ था। दीपावली के दो दिन पूर्व कार्तिक त्रयोदशी अर्थात धन त्रयोदशी को आदि प्रणेता, जीवों के जीवन की रक्षा, स्वास्थ्य, स्वस्थ जीवन शैली के प्रदाता के रूप में प्रतिष्ठित ऋषि धन्वंतरि और आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देवता भगवान धन्वंतरि का अवतरण दिवस मनाया जाता है।

धन्वंतरि से प्रार्थना की जाती है कि वे समस्त जगत को निरोग कर मानव समाज को दीर्घायुष्य प्रदान करें।  पुरातन धर्मग्रंथों के अनुसार देवताओं के वैद्य धन्वंतरि की चार भुजाएं हैं। ऊपर की दोनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किए हुए हैं जबकि दो अन्य भुजाओं में से एक में औषध तथा दूसरे में अमृत कलश धारण किए हुए हैं। रोग के सम्पूर्ण नाश के लिए भगवान धन्वंतरि द्वारा रचित धन्वंतरि संहिता आयुर्वेद का आधार ग्रंथ है।

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